रदीफ़

रदीफ़ नाही कधी जुळला
न कधीही काफ़िया सुचला
ग़ज़ल जगण्यातला तरिही
कैफ़ भरपूर अनुभवला

जिव्हारी लागतिल ऐसे
कितीतरी वार परतविले
तरी एल्गार लढण्याचा
जखम गहिरी असून केला

सदैवच लागले होते
ध्यान हे ऐहिकापार
इकडच्या ऊनछायेचा
कधी अफ़सोस ना केला

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बिल्ली आई एक कलूटी, छींके ऊपर देखी मटकी।
कूदी, लपकी उछली, लटकी, यहाँ चढ़ी वहाँ से टपकी।
ऊपर नीचे उलझी-अटकी, मगर मिली ना घी की मटकी।
अम्माँ की फिर टूटी झपकी, गई बेचारी मारी डपटी।
पछताती फिर भागी सटकी, भाग्य कहाँ जो छींका टूटे,
या फिर फूटे-घी की मटकी!